अर्थ जगत
ईज ऑफ डूइंग बिजनेस: निवेशकों के भरोसे को कानून का आधार, छत्तीसगढ़ में कारोबार की राह हुई आसान

रायपुर: किसी भी निवेशक के लिए सिर्फ जमीन, बिजली, पानी या बाजार की उपलब्धता ही पर्याप्त नहीं होती। वह यह भी देखता है कि कारोबार शुरू करने के लिए कितनी मंजूरियां लेनी होंगी, उनमें कितना समय लगेगा, कितनी बार विभागीय प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ेगा और नियमों के अनुपालन में कितना प्रशासनिक बोझ आएगा। इसी सोच को केंद्र में रखते हुए छत्तीसगढ़ ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सुधार की दिशा में कदम बढ़ाया है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा आगे बढ़ाई गई ‘छत्तीसगढ़ ईज ऑफ डूइंग बिजनेस विधेयक, 2026’ की व्यवस्था का उद्देश्य उद्योगों के लिए अनुमति प्रक्रिया को सरल, समयबद्ध और अधिक भरोसेमंद बनाना है। इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है- जोखिम के आधार पर अनुमति और निरीक्षण तथा विश्वास पर आधारित अनुपालन की व्यवस्था। यह बदलाव सिर्फ प्रक्रियाओं को कम करने का प्रयास नहीं है, बल्कि सरकार और उद्यमी के बीच संबंधों को एक नए भरोसे के ढांचे में बदलने की कोशिश है।
हर उद्योग के लिए एक जैसी प्रक्रिया नहीं
अब तक कई मामलों में छोटे और बड़े उद्योगों को समान तरह की प्रशासनिक प्रक्रियाओं और निरीक्षणों से गुजरना पड़ता था। नई व्यवस्था में इस दृष्टिकोण को बदलते हुए उद्योगों को उनके आकार, प्रकृति और संभावित जोखिम के आधार पर देखने की व्यवस्था की गई है।
कम जोखिम वाले उद्योगों के लिए अनुपालन प्रक्रिया को आसान बनाया जा रहा है। विशेष रूप से सूक्ष्म और लघु उद्यमों को बार-बार होने वाले विभागीय निरीक्षणों और अनावश्यक प्रक्रियागत बोझ से राहत देने पर जोर है। ऐसे मामलों में Self-Certification यानी स्व-घोषणा तथा अधिकृत विशेषज्ञों- जैसे आर्किटेक्ट या लाइसेंसधारी इंजीनियर के प्रमाण-पत्रों को महत्व दिया जाएगा।
दूसरी ओर, जिन परियोजनाओं में सुरक्षा, पर्यावरण, स्वास्थ्य या व्यापक जनहित से जुड़े जोखिम अधिक हैं, उनके लिए तकनीकी जांच और आवश्यक निरीक्षण की व्यवस्था बनी रहेगी। यानी सुधार का मतलब नियमों को खत्म करना नहीं, बल्कि जोखिम के हिसाब से नियमों और निगरानी को अधिक तर्कसंगत बनाना है।
निवेशक के लिए क्या बदलेगा?
नई व्यवस्था का सबसे सीधा असर उद्योग लगाने और कारोबार संचालित करने में लगने वाले समय तथा प्रशासनिक प्रयास पर पड़ सकता है।
1. बार-बार नवीनीकरण की जरूरत कम होगी
ऐसे लाइसेंस और अनुमतियां, जिनके लिए हर साल नवीनीकरण की आवश्यकता होती थी, उनमें वार्षिक नवीनीकरण की व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में बड़ा बदलाव किया गया है। इसका अर्थ है कि उद्यमी को हर वर्ष समान कागजी प्रक्रिया दोहराने के बजाय अपने कारोबार पर ज्यादा ध्यान देने का अवसर मिलेगा।
2. तय समय में फैसला नहीं तो ‘Deemed Approval’
निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक Deemed Approval यानी स्वतः स्वीकृति की व्यवस्था है। यदि निर्धारित समय-सीमा में संबंधित विभाग द्वारा आवेदन पर निर्णय नहीं लिया जाता है, तो निर्धारित नियमों और शर्तों के अधीन अनुमति को स्वीकृत माना जा सकेगा। इससे सबसे बड़ी समस्या ‘अनिश्चित प्रतीक्षा’ को कम करने में मदद मिल सकती है।
3. MSME को प्रक्रियागत राहत
छोटे उद्यमियों के लिए कई बार किसी उद्योग को शुरू करने से ज्यादा मुश्किल उससे जुड़ी अलग-अलग अनुमतियां हासिल करना होता है। नई व्यवस्था में जल प्रदाय, भवन अनुज्ञा जैसी कुछ बुनियादी सेवाओं को स्व-घोषणा और विशेषज्ञ प्रमाण-पत्र आधारित व्यवस्था से जोड़ने का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य यह है कि छोटे उद्यमी का समय सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने के बजाय उत्पादन, बाजार और कारोबार बढ़ाने में लगे।
4. 43 सेवाएं एकीकृत व्यवस्था में
प्रारंभिक चरण में 8 प्रमुख विभागों की 43 आवश्यक सेवाओं को इस व्यवस्था के दायरे में लाया गया है। यह एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि उद्योग लगाने वाले निवेशक के लिए अलग-अलग विभागों की प्रक्रियाओं को समझना और पूरा करना अक्सर बड़ी चुनौती होती है।
‘ट्रस्ट’ का मतलब नियमों से छूट नहीं
इस पूरी व्यवस्था की सबसे अहम बात यह है कि Trust-Based System का अर्थ नियमों से मुक्ति नहीं है। इसका अर्थ है कि कम जोखिम वाले मामलों में सरकार हर उद्यमी को पहले से संदिग्ध मानकर लगातार निरीक्षण करने के बजाय उसके स्व-घोषित अनुपालन पर भरोसा करे और आवश्यकता होने पर जोखिम आधारित जांच करे।
दूसरे शब्दों में, व्यवस्था का फोकस ‘हर किसी की जांच’ से ‘जहां जरूरत है वहां जांच’ की ओर बढ़ता है। इससे प्रशासनिक संसाधनों का भी बेहतर इस्तेमाल संभव हो सकता है। विभागों को कम जोखिम वाले मामलों में नियमित प्रक्रियाओं पर कम समय खर्च करके उच्च जोखिम वाले मामलों पर अधिक ध्यान देने का अवसर मिलेगा।
जवाबदेही भी, निगरानी भी
किसी भी सुधार की सफलता सिर्फ नियम बनाने से नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन से तय होती है। इसलिए इस व्यवस्था के साथ निगरानी और जवाबदेही का ढांचा भी महत्वपूर्ण है।
इसके लिए त्रिस्तरीय व्यवस्था प्रस्तावित है-
शीर्ष परिषद: मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में नीति और समग्र क्रियान्वयन को दिशा देने का काम।
राज्य स्तरीय समिति: मुख्य सचिव के नेतृत्व में विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और व्यवस्था की निगरानी।
जिला स्तरीय समिति: कलेक्टर की अध्यक्षता में स्थानीय स्तर पर सामने आने वाली समस्याओं और शिकायतों के समाधान पर ध्यान।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अनुमति प्रक्रिया को आसान बनाने का फैसला सिर्फ सरकारी दस्तावेजों तक सीमित न रहे, बल्कि उद्योग लगाने वाले व्यक्ति को जमीन पर भी उसका लाभ मिले।
छोटे उद्यमी से बड़े निवेशक तक असर
ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का लाभ सिर्फ बड़े औद्योगिक समूहों तक सीमित नहीं होता। इसकी सबसे बड़ी उपयोगिता छोटे उद्यमियों के लिए होती है, जिनके पास बड़ी कंपनियों की तरह अलग कानूनी, नियामकीय और प्रशासनिक टीमें नहीं होतीं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 15 लाख से अधिक MSME हैं। ऐसे में अनुमति प्रक्रिया में समय और कागजी कार्रवाई की कमी का व्यापक आर्थिक प्रभाव हो सकता है।
एक छोटे उद्यमी के लिए कुछ दिन या सप्ताह की बचत भी महत्वपूर्ण होती है। वहीं बड़े निवेश के मामले में परियोजना शुरू होने में लगने वाला समय सीधे लागत, वित्तीय दायित्व और बाजार में प्रवेश के समय को प्रभावित कर सकता है।इसलिए ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का वास्तविक अर्थ केवल ‘कम फॉर्म’ नहीं, बल्कि ‘कम अनिश्चितता और अधिक गति’ है।
निवेश के लिए भरोसे का माहौल
किसी राज्य में निवेश का फैसला केवल उपलब्ध संसाधनों के आधार पर नहीं होता। निवेशक यह भी देखता है कि सरकार की नीतियां कितनी स्पष्ट हैं, अनुमति प्रक्रिया कितनी समयबद्ध है और कारोबार शुरू होने के बाद अनुपालन कितना सरल है। छत्तीसगढ़ की नई पहल इसी भरोसे को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
रिस्क-बेस्ड और ट्रस्ट-बेस्ड व्यवस्था, Deemed Approval, वार्षिक नवीनीकरण से राहत, Self-Certification और सेवाओं के एकीकरण जैसे सुधार मिलकर ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास करते हैं, जहां सरकार का काम केवल अनुमति देना नहीं, बल्कि कारोबार के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करना हो।
आगे की चुनौती- नीति से जमीन तक
इस सुधार की असली सफलता इस बात से तय होगी कि नए प्रावधानों को जिलों और विभागों में कितनी तेजी और एकरूपता से लागू किया जाता है।
डिजिटल प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता, विभागीय समय-सीमा का पालन, अधिकारियों की जवाबदेही, उद्योगों के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन और शिकायतों के त्वरित समाधान जैसे पहलू इसकी सफलता के लिए उतने ही महत्वपूर्ण होंगे।
यदि नीति और उसके क्रियान्वयन के बीच की दूरी कम की जाती है, तो यह व्यवस्था छत्तीसगढ़ के औद्योगिक वातावरण में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है।
क्योंकि निवेशक के लिए सबसे बड़ा प्रोत्साहन केवल रियायत नहीं होता—उसे यह भरोसा चाहिए कि उसका समय महत्वपूर्ण है, प्रक्रिया स्पष्ट है और सरकार उसके साथ खड़ी है।
इसी भरोसे को संस्थागत रूप देने की दिशा में ‘छत्तीसगढ़ ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ पहल राज्य को अधिक सरल, पारदर्शी और निवेश-अनुकूल औद्योगिक वातावरण की ओर ले जाने वाला महत्वपूर्ण कदम बन सकती है।
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UPI पेमेंट पर MDR चार्ज दिवाली तक टला, ₹2,000 से ज्यादा के भुगतान पर लगना था 0.4% शुल्क

नई दिल्ली: यूपीआई (UPI) पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) चार्ज लगाने का फैसला फिलहाल टाल दिया गया है। यह नियम पहले 15 अक्टूबर से लागू होना था। प्रस्ताव के मुताबिक, दुकानदारों को ₹2,000 से ज्यादा के यूपीआई भुगतान पर 0.4% शुल्क देना पड़ता। हालांकि, आम लोगों के बीच होने वाले यूपीआई ट्रांजैक्शन फ्री रहने की बात कही गई है।
त्योहारी सीजन के बाद लागू करने की तैयारी
नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने त्योहारी सीजन को देखते हुए चार्ज लागू करने का फैसला आगे बढ़ाया है। जानकारी के मुताबिक, इसे दिवाली के तुरंत बाद लागू किया जा सकता है। हालांकि, नई तारीख का अभी ऐलान नहीं किया गया है।
दुकानदारों पर पड़ सकता है असर
प्रस्ताव लागू होने पर ₹2,000 से अधिक के पात्र यूपीआई भुगतान पर दुकानदारों को 0.4% शुल्क देना पड़ सकता है। आम लोगों के बीच होने वाले व्यक्तिगत यूपीआई ट्रांजैक्शन पर शुल्क नहीं लगने की बात कही गई है।
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GST Council 2026: 5 करोड़ से कम की टैक्स गड़बड़ी पर गिरफ्तारी नहीं, ₹10 हजार तक के मामलों में नोटिस भी नहीं

नई दिल्ली: GST काउंसिल ने कारोबारियों और टैक्सपेयर्स को राहत देते हुए GST कानून के तहत टैक्स अधिकारियों की गिरफ्तारी की शक्ति खत्म करने और क्रिमिनल प्रॉसिक्यूशन की सीमा बढ़ाने की सिफारिश की है। गुरुवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में हुई GST काउंसिल की बैठक में कई अहम फैसले लिए गए। काउंसिल ने GST मामलों में क्रिमिनल प्रॉसिक्यूशन की न्यूनतम सीमा ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹5 करोड़ करने का फैसला किया है। साथ ही सामान्य पेनल्टी को ₹25 हजार से घटाकर ₹10 हजार करने की सिफारिश की गई है।
GST अधिकारियों की गिरफ्तारी की शक्ति खत्म
GST व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव गिरफ्तारी से जुड़ा है। काउंसिल ने GST अधिकारियों की टैक्सपेयर्स को गिरफ्तार करने की शक्ति खत्म करने की सिफारिश की है। साथ ही न्यूनतम सजा का प्रावधान भी हटाने का फैसला किया गया है। अब किसी मामले में जुर्माना, जेल या दोनों में से क्या सजा होगी, इसका फैसला न्यायिक प्रक्रिया के तहत अदालत करेगी। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि टैक्स चोरी या गलत ITC लेने पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। टैक्स की रिकवरी, ब्याज और लागू पेनल्टी की कार्रवाई जारी रहेगी।
₹1 करोड़ की जगह ₹5 करोड़ हुई प्रॉसिक्यूशन लिमिट
अब तक ₹1 करोड़ की टैक्स गड़बड़ी पर क्रिमिनल प्रॉसिक्यूशन शुरू किया जा सकता था। काउंसिल ने इस सीमा को पांच गुना बढ़ाकर ₹5 करोड़ करने की सिफारिश की है। इसका उद्देश्य छोटे और सामान्य टैक्स विवादों को आपराधिक कार्रवाई के दायरे से बाहर रखना और गंभीर टैक्स चोरी के मामलों पर फोकस करना है।
₹10 हजार तक के मामलों में नहीं दिया जाएगा नोटिस
GST काउंसिल ने ₹10 हजार या उससे कम की राशि वाले मामलों में शो-कॉज नोटिस जारी नहीं करने का फैसला किया है। पहले से लंबित ऐसे नोटिस वापस लेने का भी प्रावधान किया गया है। इससे छोटी रकम से जुड़े मामलों में कारोबारियों पर होने वाली कागजी और कानूनी कार्रवाई कम होगी।
सामान्य पेनल्टी ₹25 हजार से घटकर ₹10 हजार
जहां किसी विशेष उल्लंघन के लिए अलग पेनल्टी तय नहीं है, वहां लागू होने वाली जनरल पेनल्टी ₹25 हजार से घटाकर ₹10 हजार करने की सिफारिश की गई है। वहीं रिटर्न दाखिल करने में देरी, गलती या टैक्स भुगतान में देरी पर टैक्स रिकवरी, ब्याज और लागू अनुपातिक पेनल्टी की कार्रवाई जारी रहेगी।
सही बिल वाले खरीदारों के ITC पर कमेटी करेगी अध्ययन
इनपुट टैक्स क्रेडिट यानी ITC को लेकर भी काउंसिल ने अहम कदम उठाया है। यदि किसी खरीदार के पास सही इनवॉइस है, उसने सामान प्राप्त किया है और सप्लायर को भुगतान कर दिया है, लेकिन सप्लायर की गलती या धोखाधड़ी के कारण खरीदार का ITC प्रभावित होता है, तो ऐसे मामलों की सुरक्षा व्यवस्था पर Committee of Officers अध्ययन करेगी। कमेटी को अपनी रिपोर्ट तीन महीने में देने को कहा गया है। रिपोर्ट अगली GST काउंसिल बैठक में रखी जाएगी।
छोटे ई-कॉमर्स कारोबारियों को भी राहत
काउंसिल ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए सामान बेचने वाले छोटे कारोबारियों के लिए GST अनुपालन आसान करने की सिफारिश की है। इसके तहत कुछ शर्तों के साथ ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के वेयरहाउस को दूसरे राज्य में कारोबार के प्रमुख स्थान के रूप में इस्तेमाल करने की सुविधा दी जाएगी।
GST की दरों में कोई बदलाव नहीं
बैठक में मौजूदा GST टैक्स रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया। इस बार काउंसिल का फोकस टैक्स दरों के बजाय GST व्यवस्था को सरल बनाने, अनुपालन का बोझ घटाने और टैक्स प्रशासन को आसान बनाने पर रहा।
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RBI ने बढ़ाई रेपो रेट: 5.25% से 5.50% हुई, आने वाले समय में महंगा हो सकता है लोन

मुंबई: रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने रेपो रेट में 0.25% यानी 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की है। अब रेपो रेट 5.25% से बढ़कर 5.50% हो गई है। यह फरवरी 2023 के बाद RBI की पहली दर बढ़ोतरी है। RBI की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की तीन दिन चली बैठक के बाद गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार, 7 अक्टूबर को फैसलों की जानकारी दी। RBI ने महंगाई के बढ़ते दबाव को देखते हुए अपनी मौद्रिक नीति का रुख भी ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ यानी चरणबद्ध सख्ती की ओर किया है।
EMI पर पड़ सकता है असर
रेपो रेट वह दर है जिस पर RBI बैंकों को अल्प अवधि के लिए कर्ज देता है। इसमें बढ़ोतरी होने पर बैंकों की फंडिंग लागत बढ़ सकती है। इसका असर आगे चलकर फ्लोटिंग रेट वाले होम लोन, पर्सनल लोन और अन्य कर्ज की ब्याज दरों और EMI पर पड़ सकता है। हालांकि, इसका असर हर बैंक और हर लोन पर एक जैसा या तुरंत होना जरूरी नहीं है।
महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.2%
RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.2% कर दिया है। बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों, खाद्य कीमतों और मौसम से जुड़े जोखिमों को महंगाई के लिए चुनौती माना गया है।
GDP ग्रोथ का अनुमान भी बढ़ा
महंगाई की चिंता के बावजूद RBI ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ग्रोथ आउटलुक बेहतर किया है। FY27 में GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7% से बढ़ाकर 7.1% कर दिया गया है। पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून में भारत की GDP ग्रोथ 7.8% रही थी, जो RBI के अनुमान से बेहतर थी। इसी मजबूत आर्थिक गतिविधि को आगे की ग्रोथ के लिए सकारात्मक संकेत माना गया है।
Q2 में 7.2% और Q3 में 6.9% ग्रोथ का अनुमान
RBI के अनुमान के मुताबिक FY27 की दूसरी तिमाही में GDP ग्रोथ 7.2% और तीसरी तिमाही में 6.9% रह सकती है। चौथी तिमाही के लिए ग्रोथ अनुमान 6.8% पर बरकरार रखा गया है। RBI के सामने एक तरफ मजबूत आर्थिक गतिविधि है, वहीं दूसरी तरफ महंगाई और वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों से जुड़े जोखिम हैं। इसी संतुलन को देखते हुए केंद्रीय बैंक ने ब्याज दर बढ़ाने का फैसला किया है।
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World Bank ने बढ़ाया भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान, FY27 में 7.1% की रफ्तार

नई दिल्ली: वर्ल्ड बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7.1% कर दिया है। अप्रैल में संस्था ने FY27 में भारत की आर्थिक वृद्धि 6.6% रहने का अनुमान लगाया था। नया अनुमान मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को जारी ताजा India Development Update में सामने आया है।
वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है। FY27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में GDP ग्रोथ 7.8% रही, जिसने पूरे वित्त वर्ष के अनुमान को ऊपर करने में अहम भूमिका निभाई।
गांव-शहरों में मांग बढ़ी, एक्सपोर्ट ने भी दिया सहारा
वर्ल्ड बैंक के अनुसार भारत की ग्रोथ को सबसे ज्यादा निजी खपत और निवेश से मजबूती मिली है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अच्छी कृषि गतिविधि, ग्रामीण आय सहायता, खाद्य सब्सिडी और कम महंगाई से सहारा मिला। वहीं, शहरी खपत को इनकम टैक्स में राहत और GST कटौती से बढ़ावा मिला। एक्सपोर्ट ने भी उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है, जिसे FY27 के ग्रोथ आउटलुक के लिए सकारात्मक संकेत माना गया है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और पावर सेक्टर में तेज ग्रोथ
सप्लाई साइड पर इंडस्ट्रियल एक्टिविटी ने भी बेहतर प्रदर्शन किया। पहली तिमाही में इंफ्रास्ट्रक्चर और कंस्ट्रक्शन गुड्स की ग्रोथ 7.2% रही, जबकि एक साल पहले यह 6.1% थी। गर्मी के दौरान बिजली की मांग बढ़ने से इलेक्ट्रिसिटी सेक्टर में 9.3% की ग्रोथ दर्ज की गई। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, मजबूत औद्योगिक गतिविधि कृषि क्षेत्र में कमजोरी की भरपाई करने में मदद कर सकती है।
कृषि क्षेत्र पर बारिश की कमी का असर
वर्ल्ड बैंक ने कृषि क्षेत्र को लेकर कुछ चिंता भी जताई है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान बारिश में कमी रही, हालांकि जुलाई के बाद हुई बारिश ने स्थिति में सुधार किया है। इसके बावजूद पूरे मानसून सीजन की कमी से कृषि उत्पादन और ग्रामीण मांग पर कुछ असर पड़ने की आशंका है।
FY26 में 7.8% रही भारत की ग्रोथ
वर्ल्ड बैंक के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था FY26 में 7.8% की दर से बढ़ी, जबकि FY25 में यह वृद्धि 7.2% रही थी। मजबूत निवेश, निजी खपत और अनुकूल वित्तीय एवं नीतिगत परिस्थितियों ने वैश्विक व्यापार संबंधी चुनौतियों के असर को कम करने में मदद की। हालांकि, वर्ल्ड बैंक ने आगे की तिमाहियों में ग्रोथ की रफ्तार कुछ कम होने की संभावना जताई है। वैश्विक तेल कीमतें, El Niño और शेयर बाजार में संभावित उतार-चढ़ाव जैसे जोखिम भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बने रह सकते हैं।
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CAFE-3 नियम लागू: EV और हाइब्रिड कारों को बढ़ावा, पेट्रोल-डीजल गाड़ियों में भी बढ़ेगी फ्यूल एफिशिएंसी

नई दिल्ली: आने वाले वर्षों में कारों की फ्यूल एफिशिएंसी और टेक्नोलॉजी में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। केंद्र सरकार ने पैसेंजर वाहनों के लिए CAFE-3 (Corporate Average Fuel Economy) नियम नोटिफाई कर दिए हैं। ये नियम 1 अप्रैल 2027 से 31 मार्च 2032 तक लागू रहेंगे। सरकार के मुताबिक, नए नियमों का लक्ष्य पांच साल में फ्यूल एफिशिएंसी में करीब 16.7% सुधार करना है।
CAFE-3 के तहत कंपनियों को अपने पूरे वाहन पोर्टफोलियो की औसत फ्यूल खपत और उत्सर्जन तय मानकों के भीतर रखना होगा। इसके लिए कंपनियों के पास EV, हाइब्रिड, वैकल्पिक ईंधन और फ्यूल-सेविंग टेक्नोलॉजी जैसे कई रास्ते होंगे।
CAFE-3 में सबसे बड़ा बदलाव क्या?
CAFE-3 में फ्यूल एफिशिएंसी का लक्ष्य हर साल और सख्त होगा। 1,229 किलो के रेफरेंस फ्लीट वजन वाले निर्माता के लिए अनुमत औसत फ्यूल खपत 2027-28 में 3.996 लीटर/100 किमी से घटकर 2031-32 में 3.3273 लीटर/100 किमी हो जाएगी। यानी सरकार ने हर कार के लिए कोई एक निश्चित माइलेज तय नहीं किया है। कंपनी की बेची गई सभी पात्र गाड़ियों के बिक्री-भारित औसत के आधार पर अनुपालन देखा जाएगा।
वजन के हिसाब से भी तय होगा लक्ष्य
नए नियमों में रेफरेंस वजन 1,082 किलो से बढ़ाकर 1,229 किलो किया गया है। भारी वाहनों के लिए ज्यादा फ्यूल एफिशिएंसी हासिल करने का दबाव रहेगा, जबकि हल्के वाहनों के लिए लक्ष्य अपेक्षाकृत नरम रखा गया है।
EV बेचने पर 3 गुना ‘सुपर क्रेडिट’
CAFE-3 में कंपनियों को ज्यादा क्लीन टेक्नोलॉजी वाली गाड़ियों के लिए सुपर क्रेडिट मिलेगा। इसका मतलब है कि अनुपालन की गणना में ऐसी गाड़ियों का वजन सामान्य वाहनों से ज्यादा माना जाएगा।
- बैटरी इलेक्ट्रिक वाहन (BEV): 3 गुना
- रेंज-एक्सटेंडेड EV (REEV): 3 गुना
- प्लग-इन हाइब्रिड: 2.5 गुना
- फ्लेक्स-फ्यूल स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड: 2.5 गुना
- स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड: 1.6 गुना
- फ्लेक्स-फ्यूल एथेनॉल वाहन: 1.1 गुना
इसका उदाहरण ऐसे समझें: अगर किसी कंपनी की 10,000 बैटरी EV बिक्री होती है, तो सुपर क्रेडिट गणना में उनका फैक्टर 3 होने के कारण इनकी प्रभावी गिनती 30,000 के बराबर हो सकती है।
कंपनियों के लिए सिर्फ EV ही रास्ता नहीं
CAFE-3 को टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल रखा गया है। कंपनियां EV के अलावा हाइब्रिड, एथेनॉल, CNG, बायोफ्यूल और अन्य फ्यूल-एफिशिएंट टेक्नोलॉजी के जरिए भी अपने अनुपालन में सुधार कर सकती हैं। वैकल्पिक ईंधनों के लिए Carbon Neutrality Factor की व्यवस्था भी की गई है। इससे ऑटो कंपनियों को अपने पोर्टफोलियो में अलग-अलग पावरट्रेन का संतुलन बनाने की गुंजाइश मिलेगी।
पेट्रोल-डीजल कारों में 12 टेक्नोलॉजी का फायदा
CAFE-3 में फ्यूल बचाने वाली तकनीकों की सूची को 4 से बढ़ाकर 12 किया गया है। प्रत्येक पात्र तकनीक के लिए 1 ग्राम CO₂/किमी तक की छूट मिल सकती है, हालांकि कुल लाभ की सीमा 9 ग्राम CO₂/किमी है।
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