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अर्थ जगत

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस: निवेशकों के भरोसे को कानून का आधार, छत्तीसगढ़ में कारोबार की राह हुई आसान

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रायपुर: किसी भी निवेशक के लिए सिर्फ जमीन, बिजली, पानी या बाजार की उपलब्धता ही पर्याप्त नहीं होती। वह यह भी देखता है कि कारोबार शुरू करने के लिए कितनी मंजूरियां लेनी होंगी, उनमें कितना समय लगेगा, कितनी बार विभागीय प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ेगा और नियमों के अनुपालन में कितना प्रशासनिक बोझ आएगा। इसी सोच को केंद्र में रखते हुए छत्तीसगढ़ ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सुधार की दिशा में कदम बढ़ाया है।

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा आगे बढ़ाई गई ‘छत्तीसगढ़ ईज ऑफ डूइंग बिजनेस विधेयक, 2026’ की व्यवस्था का उद्देश्य उद्योगों के लिए अनुमति प्रक्रिया को सरल, समयबद्ध और अधिक भरोसेमंद बनाना है। इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है- जोखिम के आधार पर अनुमति और निरीक्षण तथा विश्वास पर आधारित अनुपालन की व्यवस्था। यह बदलाव सिर्फ प्रक्रियाओं को कम करने का प्रयास नहीं है, बल्कि सरकार और उद्यमी के बीच संबंधों को एक नए भरोसे के ढांचे में बदलने की कोशिश है।

हर उद्योग के लिए एक जैसी प्रक्रिया नहीं

अब तक कई मामलों में छोटे और बड़े उद्योगों को समान तरह की प्रशासनिक प्रक्रियाओं और निरीक्षणों से गुजरना पड़ता था। नई व्यवस्था में इस दृष्टिकोण को बदलते हुए उद्योगों को उनके आकार, प्रकृति और संभावित जोखिम के आधार पर देखने की व्यवस्था की गई है।

कम जोखिम वाले उद्योगों के लिए अनुपालन प्रक्रिया को आसान बनाया जा रहा है। विशेष रूप से सूक्ष्म और लघु उद्यमों को बार-बार होने वाले विभागीय निरीक्षणों और अनावश्यक प्रक्रियागत बोझ से राहत देने पर जोर है। ऐसे मामलों में Self-Certification यानी स्व-घोषणा तथा अधिकृत विशेषज्ञों- जैसे आर्किटेक्ट या लाइसेंसधारी इंजीनियर के प्रमाण-पत्रों को महत्व दिया जाएगा।

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दूसरी ओर, जिन परियोजनाओं में सुरक्षा, पर्यावरण, स्वास्थ्य या व्यापक जनहित से जुड़े जोखिम अधिक हैं, उनके लिए तकनीकी जांच और आवश्यक निरीक्षण की व्यवस्था बनी रहेगी। यानी सुधार का मतलब नियमों को खत्म करना नहीं, बल्कि जोखिम के हिसाब से नियमों और निगरानी को अधिक तर्कसंगत बनाना है।

निवेशक के लिए क्या बदलेगा?

नई व्यवस्था का सबसे सीधा असर उद्योग लगाने और कारोबार संचालित करने में लगने वाले समय तथा प्रशासनिक प्रयास पर पड़ सकता है।

1. बार-बार नवीनीकरण की जरूरत कम होगी

ऐसे लाइसेंस और अनुमतियां, जिनके लिए हर साल नवीनीकरण की आवश्यकता होती थी, उनमें वार्षिक नवीनीकरण की व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में बड़ा बदलाव किया गया है। इसका अर्थ है कि उद्यमी को हर वर्ष समान कागजी प्रक्रिया दोहराने के बजाय अपने कारोबार पर ज्यादा ध्यान देने का अवसर मिलेगा।

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2. तय समय में फैसला नहीं तो ‘Deemed Approval’

निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक Deemed Approval यानी स्वतः स्वीकृति की व्यवस्था है। यदि निर्धारित समय-सीमा में संबंधित विभाग द्वारा आवेदन पर निर्णय नहीं लिया जाता है, तो निर्धारित नियमों और शर्तों के अधीन अनुमति को स्वीकृत माना जा सकेगा। इससे सबसे बड़ी समस्या ‘अनिश्चित प्रतीक्षा’ को कम करने में मदद मिल सकती है।

3. MSME को प्रक्रियागत राहत

छोटे उद्यमियों के लिए कई बार किसी उद्योग को शुरू करने से ज्यादा मुश्किल उससे जुड़ी अलग-अलग अनुमतियां हासिल करना होता है। नई व्यवस्था में जल प्रदाय, भवन अनुज्ञा जैसी कुछ बुनियादी सेवाओं को स्व-घोषणा और विशेषज्ञ प्रमाण-पत्र आधारित व्यवस्था से जोड़ने का प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य यह है कि छोटे उद्यमी का समय सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने के बजाय उत्पादन, बाजार और कारोबार बढ़ाने में लगे।

4. 43 सेवाएं एकीकृत व्यवस्था में

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प्रारंभिक चरण में 8 प्रमुख विभागों की 43 आवश्यक सेवाओं को इस व्यवस्था के दायरे में लाया गया है। यह एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि उद्योग लगाने वाले निवेशक के लिए अलग-अलग विभागों की प्रक्रियाओं को समझना और पूरा करना अक्सर बड़ी चुनौती होती है।

‘ट्रस्ट’ का मतलब नियमों से छूट नहीं

इस पूरी व्यवस्था की सबसे अहम बात यह है कि Trust-Based System का अर्थ नियमों से मुक्ति नहीं है। इसका अर्थ है कि कम जोखिम वाले मामलों में सरकार हर उद्यमी को पहले से संदिग्ध मानकर लगातार निरीक्षण करने के बजाय उसके स्व-घोषित अनुपालन पर भरोसा करे और आवश्यकता होने पर जोखिम आधारित जांच करे।

दूसरे शब्दों में, व्यवस्था का फोकस ‘हर किसी की जांच’ से ‘जहां जरूरत है वहां जांच’ की ओर बढ़ता है। इससे प्रशासनिक संसाधनों का भी बेहतर इस्तेमाल संभव हो सकता है। विभागों को कम जोखिम वाले मामलों में नियमित प्रक्रियाओं पर कम समय खर्च करके उच्च जोखिम वाले मामलों पर अधिक ध्यान देने का अवसर मिलेगा।

जवाबदेही भी, निगरानी भी

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किसी भी सुधार की सफलता सिर्फ नियम बनाने से नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन से तय होती है। इसलिए इस व्यवस्था के साथ निगरानी और जवाबदेही का ढांचा भी महत्वपूर्ण है।

इसके लिए त्रिस्तरीय व्यवस्था प्रस्तावित है-

शीर्ष परिषद: मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में नीति और समग्र क्रियान्वयन को दिशा देने का काम।

राज्य स्तरीय समिति: मुख्य सचिव के नेतृत्व में विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और व्यवस्था की निगरानी।

जिला स्तरीय समिति: कलेक्टर की अध्यक्षता में स्थानीय स्तर पर सामने आने वाली समस्याओं और शिकायतों के समाधान पर ध्यान।

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इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अनुमति प्रक्रिया को आसान बनाने का फैसला सिर्फ सरकारी दस्तावेजों तक सीमित न रहे, बल्कि उद्योग लगाने वाले व्यक्ति को जमीन पर भी उसका लाभ मिले।

छोटे उद्यमी से बड़े निवेशक तक असर

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का लाभ सिर्फ बड़े औद्योगिक समूहों तक सीमित नहीं होता। इसकी सबसे बड़ी उपयोगिता छोटे उद्यमियों के लिए होती है, जिनके पास बड़ी कंपनियों की तरह अलग कानूनी, नियामकीय और प्रशासनिक टीमें नहीं होतीं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 15 लाख से अधिक MSME हैं। ऐसे में अनुमति प्रक्रिया में समय और कागजी कार्रवाई की कमी का व्यापक आर्थिक प्रभाव हो सकता है।

एक छोटे उद्यमी के लिए कुछ दिन या सप्ताह की बचत भी महत्वपूर्ण होती है। वहीं बड़े निवेश के मामले में परियोजना शुरू होने में लगने वाला समय सीधे लागत, वित्तीय दायित्व और बाजार में प्रवेश के समय को प्रभावित कर सकता है।इसलिए ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का वास्तविक अर्थ केवल ‘कम फॉर्म’ नहीं, बल्कि ‘कम अनिश्चितता और अधिक गति’ है।

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निवेश के लिए भरोसे का माहौल

किसी राज्य में निवेश का फैसला केवल उपलब्ध संसाधनों के आधार पर नहीं होता। निवेशक यह भी देखता है कि सरकार की नीतियां कितनी स्पष्ट हैं, अनुमति प्रक्रिया कितनी समयबद्ध है और कारोबार शुरू होने के बाद अनुपालन कितना सरल है। छत्तीसगढ़ की नई पहल इसी भरोसे को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

रिस्क-बेस्ड और ट्रस्ट-बेस्ड व्यवस्था, Deemed Approval, वार्षिक नवीनीकरण से राहत, Self-Certification और सेवाओं के एकीकरण जैसे सुधार मिलकर ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास करते हैं, जहां सरकार का काम केवल अनुमति देना नहीं, बल्कि कारोबार के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करना हो।

आगे की चुनौती- नीति से जमीन तक

इस सुधार की असली सफलता इस बात से तय होगी कि नए प्रावधानों को जिलों और विभागों में कितनी तेजी और एकरूपता से लागू किया जाता है।

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डिजिटल प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता, विभागीय समय-सीमा का पालन, अधिकारियों की जवाबदेही, उद्योगों के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन और शिकायतों के त्वरित समाधान जैसे पहलू इसकी सफलता के लिए उतने ही महत्वपूर्ण होंगे।

यदि नीति और उसके क्रियान्वयन के बीच की दूरी कम की जाती है, तो यह व्यवस्था छत्तीसगढ़ के औद्योगिक वातावरण में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है।

क्योंकि निवेशक के लिए सबसे बड़ा प्रोत्साहन केवल रियायत नहीं होता—उसे यह भरोसा चाहिए कि उसका समय महत्वपूर्ण है, प्रक्रिया स्पष्ट है और सरकार उसके साथ खड़ी है।

इसी भरोसे को संस्थागत रूप देने की दिशा में ‘छत्तीसगढ़ ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ पहल राज्य को अधिक सरल, पारदर्शी और निवेश-अनुकूल औद्योगिक वातावरण की ओर ले जाने वाला महत्वपूर्ण कदम बन सकती है।

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GDP Growth: महंगाई की चिंता के बीच अर्थव्यवस्था ने पकड़ी रफ्तार, पहली तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8%; GVA 8.2% बढ़ा

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भारत की अर्थव्यवस्था ने FY2026-27 की पहली तिमाही में 7.8% GDP ग्रोथ दर्ज की। नॉमिनल GDP 10.3% और रियल GVA 8.2% बढ़ा। जानिए नए GDP बेस ईयर और आंकड़ों की पूरी जानकारी।

नई दिल्ली: महंगाई और वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत मजबूत बढ़त के साथ की है। अप्रैल-जून तिमाही में देश की रियल GDP 7.8% की दर से बढ़ी है। सोमवार को जारी मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन (MoSPI) के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही में रियल GDP 75.46 लाख करोड़ रुपए थी, जो इस बार बढ़कर 81.36 लाख करोड़ रुपए हो गई।

मौजूदा कीमतों पर यानी नॉमिनल GDP भी 10.3% बढ़ी है। यह अप्रैल-जून 2026 में 88.27 लाख करोड़ रुपए रही, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह 80 लाख करोड़ रुपए थी।

GVA की रफ्तार GDP से भी ज्यादा

अर्थव्यवस्था की गतिविधियों को मापने वाले रियल ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) में भी मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है। Q1 FY2026-27 में रियल GVA 8.2% बढ़कर 73.82 लाख करोड़ रुपए हो गया। एक साल पहले इसी तिमाही में यह 68.21 लाख करोड़ रुपए था। मौजूदा कीमतों पर नॉमिनल GVA की ग्रोथ 11.5% रही और यह 80.53 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

नए बेस ईयर से बदली GDP की तस्वीर

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MoSPI ने इस बार GDP के आंकड़ों की गणना के लिए 2022-23 को बेस ईयर बनाया है। इससे पहले GDP की गणना 2011-12 को आधार मानकर की जाती थी। सरकार ने 27 फरवरी 2026 को 2022-23 बेस ईयर वाली GDP की नई सीरीज जारी की थी। इसके बाद 5 जून को वित्त वर्ष 2025-26 के प्रोविजनल GDP आंकड़े जारी किए गए थे। अब Q1 FY2026-27 के आंकड़ों के साथ पुराने वर्षों और तिमाहियों के आंकड़ों को भी अपडेट किया गया है।

2022-23 से अब तक के आंकड़े भी अपडेट

नई सीरीज के तहत वित्त वर्ष 2022-23, 2023-24 और 2024-25 के वार्षिक GDP आंकड़ों को संशोधित किया गया है। इसके अलावा 2022-23 की पहली तिमाही से 2025-26 की चौथी तिमाही तक के तिमाही आंकड़ों में भी नए डेटा को शामिल किया गया है। MoSPI के मुताबिक इन संशोधनों में विभिन्न सरकारी विभागों से मिले अपडेटेड प्रशासनिक आंकड़ों के साथ नए उत्पादन और मूल्य संबंधी डेटा का इस्तेमाल किया गया है।

GDP की गणना में किन आंकड़ों का इस्तेमाल होता है?

GDP तैयार करने के लिए अर्थव्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों से मिलने वाले आंकड़ों को शामिल किया जाता है। इनमें औद्योगिक उत्पादन, कीमतों से जुड़े इंडेक्स, बैंकिंग सेवाएं और विभिन्न सरकारी विभागों से मिलने वाले प्रशासनिक आंकड़े प्रमुख हैं। खर्च के आधार पर भी अर्थव्यवस्था की तस्वीर तैयार की जाती है। इसमें निजी खपत, सरकारी खर्च, निवेश, निर्यात और आयात जैसे आंकड़े शामिल होते हैं। ये आंकड़े स्थिर कीमतों और मौजूदा कीमतों दोनों के आधार पर जारी किए जाते हैं।

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सरकार ने डेटा में सुधार और नए स्रोत जोड़े

नई GDP सीरीज में सिर्फ बेस ईयर बदला नहीं गया है, बल्कि आंकड़े जुटाने और अर्थव्यवस्था को मापने की प्रक्रिया में भी बदलाव किए गए हैं। MoSPI ने अपडेटेड औद्योगिक उत्पादन, कीमतों और अलग-अलग प्रशासनिक स्रोतों से मिले डेटा को नई गणना में शामिल किया है। MoSPI ने यह भी स्पष्ट किया है कि GDP के ये आंकड़े आगे चलकर संशोधित हो सकते हैं। नए डेटा और स्रोत एजेंसियों से मिलने वाली जानकारी के आधार पर बाद की रिलीज में आंकड़ों में बदलाव संभव है।

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Packaged Food Safety: नमक, शुगर या सैचुरेटेड फैट ज्यादा हुआ तो फ्रंट पर लगेगा रेड लेबल; FSSAI का सुप्रीम कोर्ट में प्रस्ताव

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नई दिल्ली: पैकेट बंद खाने-पीने की चीजों में अगर नमक, शुगर या सैचुरेटेड फैट तय सीमा से ज्यादा हुआ तो इसकी जानकारी अब पैकेट के सामने ही मिल सकती है। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने सुप्रीम कोर्ट में ऐसे उत्पादों पर लाल रंग का षटकोण (हेक्सागोन) चेतावनी लेबल लगाने का प्रस्ताव दिया है।

प्रस्ताव के मुताबिक यह चेतावनी पैकेट के फ्रंट यानी सामने की तरफ दिखाई देगी। इसका उद्देश्य ग्राहकों को ज्यादा नमक, चीनी और फैट वाले खाद्य उत्पादों के बारे में खरीदारी से पहले ही सचेत करना है।

दो चरणों में लागू करने का प्रस्ताव

FSSAI ने इस व्यवस्था को दो चरणों में लागू करने का प्रस्ताव दिया है, ताकि खाद्य उद्योग को नए नियमों के मुताबिक अपने उत्पादों और पैकेजिंग में बदलाव करने का समय मिल सके।

फेज-1: पहले चरण में उन उत्पादों पर लाल चेतावनी लेबल लगाया जाएगा, जिनमें फैट, शुगर या साल्ट में से दो या उससे ज्यादा पोषक तत्व तय सीमा से अधिक होंगे। इसमें ज्यादा मीठी कोल्ड ड्रिंक्स भी शामिल होंगी।

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फेज-2: दूसरे चरण में उन उत्पादों को भी चेतावनी लेबल के दायरे में लाया जाएगा, जिनमें इनमें से कोई एक तत्व तय सीमा से अधिक होगा।

सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचा मामला?

पैकेट बंद और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों पर अनिवार्य चेतावनी लेबल लगाने की मांग को लेकर 3S एंड अवर हेल्थ सोसाइटी नाम के पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

मामले की पिछली सुनवाई 13 अगस्त को हुई थी। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने नियम बनाने में देरी को लेकर FSSAI को फटकार लगाई थी। कोर्ट ने सवाल किया था कि क्या सरकार नहीं चाहती कि उसके लोग स्वस्थ रहें? इसके बाद FSSAI ने सुप्रीम कोर्ट में अपना हलफनामा दाखिल कर प्रस्तावित व्यवस्था की जानकारी दी।

किस आधार पर तय होगा कि फूड ‘हाई फैट, हाई शुगर या हाई साल्ट’ है?

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FSSAI के मुताबिक किसी खाद्य उत्पाद को High Fat, Sugar and Salt (HFSS) की श्रेणी में रखने का आधार ICMR-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (ICMR-NIN) की Dietary Guidelines for Indians, 2024 में दिए गए मानक होंगे। यानी किसी प्रोडक्ट में फैट, शुगर या नमक की मात्रा तय सीमा से अधिक है या नहीं, इसका आकलन निर्धारित पोषण मानकों के आधार पर किया जाएगा।

किन चीजों को लाल चेतावनी लेबल से छूट मिलेगी?

प्रस्ताव में कुछ खाद्य पदार्थों को फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल से बाहर रखने की बात कही गई है। इनमें मुख्य रूप से सिंगल-इंग्रीडिएंट यानी केवल एक सामग्री वाले उत्पाद, शुद्ध घी. खाद्य तेल, साधारण नमक, चीनी, गुड़, शहद जैसे उत्पाद शामिल हैं।

क्या है ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’?

Front of Pack Labelling (FOPL) का मतलब है कि खाद्य उत्पाद की जरूरी पोषण संबंधी जानकारी पैकेट के सामने ही आसान तरीके से दिखाई जाए। अभी ज्यादातर पैकेज्ड फूड में कैलोरी, फैट, प्रोटीन, शुगर और सोडियम जैसी जानकारी पैकेट के पीछे या किनारे पर न्यूट्रिशन टेबल में दी जाती है। इसे पढ़ने और समझने में ग्राहक को समय लग सकता है।

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FOPL का उद्देश्य यही है कि ग्राहक पैकेट उठाते ही आसानी से समझ सके कि उसमें नमक, शुगर या फैट की मात्रा ज्यादा है या नहीं।

नए लेबल से क्या फायदा होगा?

FSSAI का कहना है कि फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी से ग्राहक ज्यादा जागरूक होकर खाद्य उत्पाद चुन सकेंगे। खासतौर पर बच्चों और समाज के संवेदनशील वर्गों को इसका फायदा मिलने की उम्मीद है।

लाल रंग का चेतावनी चिन्ह पैकेट के सामने होने से ग्राहक को लंबे न्यूट्रिशन चार्ट को पढ़े बिना ही यह संकेत मिल सकेगा कि संबंधित खाद्य उत्पाद में कुछ पोषक तत्व अधिक मात्रा में मौजूद हैं।

अभी पैकेट पर पोषण संबंधी जानकारी कैसे मिलती है?

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मौजूदा व्यवस्था में पोषण संबंधी जानकारी आमतौर पर पैकेट के पीछे या किनारे पर टेबल के रूप में दी जाती है। इसमें 100 ग्राम, 100 मिलीलीटर या एक सर्विंग के हिसाब से कैलोरी, फैट, प्रोटीन, शुगर, सोडियम आदि की मात्रा बताई जाती है। प्रस्तावित फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग में इसी जानकारी को सरल और तुरंत समझ आने वाले चेतावनी संकेत के रूप में सामने लाने की कोशिश की जा रही है।

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LPG e-KYC: आज आखिरी दिन, e-KYC नहीं कराने पर बढ़ सकता है सिलेंडर का खर्च?

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LPG e-KYC: अगर आप घरेलू LPG सिलेंडर इस्तेमाल करते हैं, तो आधार आधारित e-KYC को लेकर यह खबर आपके लिए जरूरी है। 16 अगस्त 2026 को e-KYC की डेडलाइन को लेकर ग्राहकों के बीच असमंजस बना हुआ है। कई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि तय समय तक वेरिफिकेशन पूरा नहीं होने पर घरेलू LPG की आपूर्ति और सब्सिडी से जुड़ी सुविधाएं प्रभावित हो सकती हैं। हालांकि, कनेक्शन सीधे रद्द होने की बात स्पष्ट नहीं है।

सवाल 1: क्या आज e-KYC कराने का आखिरी दिन है?

रिपोर्टों के मुताबिक, जिन LPG ग्राहकों का आधार आधारित e-KYC अभी तक पूरा नहीं हुआ है, उनके लिए 16 अगस्त 2026 महत्वपूर्ण तारीख है। हालांकि, अलग-अलग जगहों पर समयसीमा को लेकर अलग जानकारी सामने आई है। इसलिए ग्राहकों को अपने गैस डिस्ट्रीब्यूटर या संबंधित तेल कंपनी से स्थिति की पुष्टि कर लेनी चाहिए।

सवाल 2: e-KYC नहीं कराने पर क्या गैस कनेक्शन रद्द हो जाएगा?

नहीं, उपलब्ध जानकारी के अनुसार केवल समयसीमा चूकने से कनेक्शन तत्काल रद्द होने की बात नहीं कही गई है। लेकिन जिन ग्राहकों का वेरिफिकेशन अधूरा है, उनकी LPG सेवा या सब्सिडी से जुड़ी सुविधाएं अस्थायी रूप से प्रभावित हो सकती हैं, जब तक e-KYC पूरा नहीं हो जाता।

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सवाल 3: उज्ज्वला लाभार्थियों पर क्या असर पड़ेगा?

PMUY यानी प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए पहचान और लाभार्थी सत्यापन महत्वपूर्ण है। PMUY के तहत पात्र लाभार्थियों को प्रति 14.2 किलो सिलेंडर पर लक्षित सब्सिडी का प्रावधान है, जो सीधे बैंक खाते में भेजी जाती है। e-KYC अधूरी रहने पर इस लाभ पर असर पड़ने की आशंका है।

सवाल 4: क्या घरेलू सिलेंडर की जगह कमर्शियल रेट देना पड़ेगा?

इस दावे को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में अलग जानकारी है। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि e-KYC पूरा न होने पर घरेलू दर पर LPG की आपूर्ति अस्थायी रूप से प्रभावित हो सकती है, लेकिन घरेलू उपभोक्ताओं को सीधे कमर्शियल सिलेंडर खरीदना अनिवार्य होगा, इसकी स्पष्ट आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

सवाल 5: e-KYC कैसे कराएं?

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ग्राहक संबंधित तेल कंपनी के ऐप, फेस ऑथेंटिकेशन, गैस एजेंसी या डिलीवरी कर्मी की मदद से e-KYC प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं। जिन ग्राहकों को ऑनलाइन प्रक्रिया में दिक्कत हो, वे अपने LPG डिस्ट्रीब्यूटर से संपर्क कर सकते हैं।

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Polymer Currency India: ₹10 और ₹20 के पॉलीमर नोट आएंगे, सरकार ने 100-100 करोड़ नोटों के फील्ड ट्रायल को दी मंजूरी

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नई दिल्ली: भारत में अब ₹10 और ₹20 के पॉलीमर यानी प्लास्टिक बैंक नोट आने का रास्ता साफ हो गया है। सरकार ने दोनों मूल्यवर्ग के 100-100 करोड़ पॉलीमर नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दे दी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार को राज्यसभा में लिखित जवाब में यह जानकारी दी।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ₹10 और ₹20 के पॉलीमर नोटों के ट्रायल का प्रस्ताव दिया था। ट्रायल सफल रहने के बाद इन नोटों को नियमित रूप से जारी किया जा सकता है। RBI के मुताबिक, पॉलीमर नोट मौजूदा कागजी नोटों के साथ ही चलेंगे।

क्या होता है पॉलीमर नोट?

पॉलीमर नोट कागज के बजाय एक खास तरह के प्लास्टिक मटेरियल यानी पॉलीमर सब्सट्रेट से बनाए जाते हैं। ये सामान्य नोटों की तरह हल्के होते हैं, लेकिन पानी, धूल और नमी से जल्दी खराब नहीं होते। RBI के मुताबिक ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा समेत कई देशों में पॉलीमर करेंसी का इस्तेमाल किया जा रहा है।

टिकाऊ होती है पॉलीमर करेंसी

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पॉलीमर नोटों की सबसे बड़ी खासियत उनकी लंबी उम्र है। कागजी नोटों के मुकाबले ये कम फटते हैं और पानी में भीगने के बाद भी खराब नहीं होते। इससे कम समय में नोट बदलने की जरूरत घट सकती है।

नकली नोटों पर भी लगेगी लगाम

पॉलीमर सब्सट्रेट में एडवांस सिक्योरिटी फीचर्स शामिल किए जा सकते हैं। इससे नोटों की नकल करना मुश्किल होगा और नकली नोटों पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है।

नोट छापने का खर्च भी घट सकता है

कागजी नोट जल्दी खराब होने के कारण उन्हें बार-बार बदलना पड़ता है। इससे नए नोटों की छपाई पर खर्च बढ़ता है। वित्त वर्ष 2024-25 में RBI ने बैंक नोटों की प्रिंटिंग पर ₹6,372.8 करोड़ खर्च किए थे। पॉलीमर नोट ज्यादा समय तक चलने की वजह से लंबे समय में नोटों की छपाई और रिप्लेसमेंट की लागत कम होने की उम्मीद है।

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अभी ट्रायल होगा, फिर फैसला

फिलहाल ₹10 और ₹20 के पॉलीमर नोटों का फील्ड ट्रायल किया जाएगा। ट्रायल के दौरान इनकी टिकाऊ क्षमता, इस्तेमाल और व्यवहारिकता का आकलन किया जाएगा। इसके परिणाम के आधार पर इन्हें नियमित रूप से जारी करने पर फैसला होगा।

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UPI चार्ज पर सरकार की सफाई, आम लोगों को नहीं देना होगा कोई शुल्क, P2P ट्रांजैक्शन रहेंगे फ्री

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UPI Charges: यूपीआई इस्तेमाल करने वाले करोड़ों लोगों के लिए राहत की खबर है। केंद्र सरकार ने साफ किया है कि आम उपभोक्ताओं से UPI भुगतान पर कोई ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं लिया जाएगा। एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति यानी P2P (Person-to-Person) ट्रांजैक्शन पहले की तरह मुफ्त रहेंगे।

वित्त मंत्रालय ने 8 अगस्त को जारी स्पष्टीकरण में कहा कि UPI पर संभावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को लेकर चल रही चर्चाओं का आम उपभोक्ताओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार के मुताबिक, यदि भविष्य में MDR लागू किया जाता है तो यह तय सीमा से ऊपर के सीमित मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर ही लागू होगा और इसकी दर डेबिट या क्रेडिट कार्ड के MDR की तुलना में काफी कम रखी जाएगी।

आम लोगों के लिए क्या बदलेगा?

सरकार के मुताबिक आम UPI यूजर्स के लिए फिलहाल कोई नया चार्ज नहीं है। P2P भुगतान मुफ्त रहेगा। पैसे भेजने या प्राप्त करने पर यूजर से शुल्क नहीं लिया जाएगा। रोजमर्रा के UPI भुगतान पर आम उपभोक्ता को चार्ज नहीं देना होगा। सरकार ने साफ किया है कि UPI नागरिकों के लिए मुफ्त रहेगा।

क्या दुकानदारों से MDR लिया जाएगा?

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सरकार ने सभी व्यापारियों पर एक साथ MDR लगाने की बात नहीं कही है। वित्त मंत्रालय के अनुसार भविष्य में यदि MDR लागू किया गया तो यह सीमित मर्चेंट ट्रांजैक्शन और एक तय सीमा से ऊपर के भुगतान तक सीमित रहेगा।सरकार ने यह भी कहा है कि UPI के अधिकांश मर्चेंट ट्रांजैक्शन मुफ्त बने रहेंगे। संभावित MDR की दर कार्ड से लगने वाले MDR से काफी कम होगी।

UPI चार्ज की चर्चा क्यों शुरू हुई?

UPI चार्ज को लेकर चर्चा Payment and Settlement Systems Act, 2007 में प्रस्तावित बदलाव के बाद शुरू हुई। सरकार के मुताबिक यह बदलाव आम लोगों से शुल्क वसूलने के लिए नहीं, बल्कि UPI सिस्टम को लंबे समय तक टिकाऊ, सुरक्षित और मजबूत बनाने के लिए किया जा रहा है। वित्त मंत्रालय ने कहा कि UPI के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर सिक्योरिटी, फ्रॉड रोकने और तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार निवेश की जरूरत है।

MDR पर अंतिम फैसला कौन करेगा?

सरकार के मुताबिक, Taxation and Other Laws (Amendment) Bill, 2026 के संसद से पारित होने के बाद MDR को लेकर अंतिम निर्णय NPCI की अध्यक्षता वाली UPI and Services Steering Committee करेगी। यानी अभी हर UPI भुगतान पर शुल्क लागू होने का कोई फैसला नहीं हुआ है।

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जुलाई में UPI से हुए ₹29.9 लाख करोड़ के ट्रांजैक्शन

वित्त मंत्रालय के अनुसार जुलाई 2026 में UPI के जरिए 2,366 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए, जिनकी कुल वैल्यू करीब ₹29.9 लाख करोड़ रही। सरकार का कहना है कि बढ़ते लेनदेन के बीच UPI को सुरक्षित और टिकाऊ बनाए रखना जरूरी है।

सीधी बात

आम यूजर के लिए UPI अभी भी फ्री है। P2P ट्रांजैक्शन पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। भविष्य में संभावित MDR का असर केवल सीमित, तय सीमा से ऊपर वाले मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर हो सकता है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि सभी व्यापारियों पर एक समान या अनिवार्य MDR नहीं लगाया जाएगा।

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